जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में आमतौर पर लेफ्ट बनाम लेफ्ट की जंग होती रही है. लेकिन अब ऐसा नहीं है. यहां दलित-बहुजन और अंबेडकरवादी राजनीति के नाम पर उभरा बापसा (बिरसा-अंबेडकर-फूले स्‍टूडेंट एसोसिएशन) भी बड़ी ताकत बन गया है.

इसने 2016 के चुनाव में लेफ्ट गठबंधन और एबीवीपी दोनों की नाक में दम कर दिया था. इस बार यह और आक्रामक है. 15 नवंबर 2014 को अस्‍तित्‍व में आया यह संगठन पिछले साल अध्‍यक्ष पद के लिए 1545 वोट लेकर दूसरे नंबर पर था. उपाध्‍यक्ष पद पर उसे तीसरा स्‍थान मिला था.

इसने लाल और भगवा झंडे को भाई-भाई बताकर वामपंथी गढ़ में छात्रों को नया विकल्‍प देने की कोशिश की है. इसने अपने गठन के बाद से कैंपस में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, मुस्‍लिमों, कश्‍मीरियों और पूर्वोत्‍तर के रहने वाले विद्यार्थियों में अपनी पैठ बनानी शुरू की. इन्‍हीं पर फोकस किया.

मीडिया से दूर रहकर इसने अपना काडर मजबूत किया. नतीजा यह हुआ कि यह लेफ्ट के लिए उन्‍हीं के गढ़ में चुनौती बन गया. जानकारों का कहना है कि सिर्फ तीन साल पहले बने इस नए संगठन के उभार से सबसे ज्‍यादा नुकसान लेफ्ट को होता दिख रहा है.

बापसा ने दलितों, पिछड़ों व मुस्लिम छात्रों पर फोकस किया

लेफ्ट की जीत का रथ रोकने के लिए एबीवीपी और बापसा दोनों खड़े हैं. इसीलिए इस बार आईसा (ऑल इंडिया स्‍टूडेंट्स एसोसिएशन), एसएफआई (स्‍टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) और डीएसएफ (डेमोक्रेटिक स्‍टूडेंट्स फेडरेशन) तीन संगठन मिलकर अपना किला बचाने में जुटे हुए हैं.

बात एबीवीपी की करें तो लेफ्ट से नाराज जो छात्र उसके साथ जुड़ते उन्‍हें बापसा में विकल्‍प मिला. बुधवार रात प्रेसिडेंशियल डिबेट में इसकी ओर से प्रेसीडेंट उम्‍मीदवार शबाना अली ने लेफ्ट-राइट दोनों को ललकारा. इस बार भी उसकी कोशिश एबीवीपी से अधिक वोट लेने की है.

आईसा के महासचिव संदीप सौरव ने बताया कि ‘हम चाहते थे कि एआईएसएफ (ऑल इंडिया स्‍टूडेंट्स फेडरेशन) भी हमारे गठबंधन में आ जाए लेकिन बात नहीं बनी. उसने कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ऑफ इंडिया से राज्‍यसभा सांसद डी. राजा की बेटी अपराजिता राजा को खड़ा दिया’. हालांकि एबीवीपी नेता सौरभ शर्मा कहते हैं कि ‘हमें किसी संगठन से दिक्‍कत नहीं है. जेएनयू में हमारा जनाधार बढ़ रहा है’.