ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) की यह पहल आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। एम्स ने ‘मरीज को अपनाओ’ नाम से एक योजना शुरू करने का फैसला लिया है। एम्स का यह फैसला उन मरीजों को देखकर लिया गया है, जिनके पास इलाज के बाद आवश्यक उपकरण खरीदने के लिए पैसे नहीं होते हैं। मजबूरी में वे अस्पतालों में ही रहते हैं।

ऐसे ही एक मरीज की कहानी से मामले को समझा जा सकता है। पिछले महीने एम्स में 50 साल की एक मरीज दयावती को लाया गया था। उनकी रीढ़ में समस्या थी जिसका सर्जरी से उपचार हो गया और उनको बचा लिया गया। इलाज के बाद वह घर जा सकती हैं लेकिन उन्होंने अस्पताल में ही रहने को प्राथमिकता दी क्योंकि उनके परिवार के पास पोर्टेबल वेंटिलेटर खरीदने के लिए पैसे नहीं है।

एम्स की इस पहल से दयावती और उनके जैसे हजारों मरीजों को मदद मिल सकती है जो सर्जरी या छुट्टी के बाद भी एम्स में ही रहने को मजबूर होते हैं क्योंकि उनके पास उपकरण खरीदने या बाद के इलाज के लिए पैसे नहीं होते।

एम्स के आईटी डिविजन के प्रमुख डॉ.दीपक अग्रवला ने बताया, ‘हम हर साल एम्स में करीब दो लाख लोगों को दाखिला देते हैं। इनमें से 30 से 40 फीसदी इतने गरीब होते हैं कि वे इंप्लांट्स के पैसे भी नहीं दे पाते हैं। स्पाइनल इंजरी के मामले में कई मरीजों को उनके परिवार के सदस्यों ने सिर्फ इसलिए अस्पताल में ही छोड़ दिया क्योंकि उनके पास इलाज जारी रखने के पैसे नहीं थे। एम्स की इस पॉलिसी से ऐसे लोगों का फायदा होगा।’

इस पॉलिसी को शनिवार को एम्स के निदेशक एम.सी.मिसरा औपचारिक तौर पर लॉन्च करेंगे। अधिकारियों ने बताया कि ट्रायल प्रक्रिया के शुरू होने के 24 घंटों के अंदर ही उनको दो लोगों से 14,000 रुपये प्राप्त हुए हैं।

डॉ.अग्रवाल ने बताया, ‘ऐसे लोगों या संगठनों की कमी नहीं है जो जरूरतमंद लोगों की मदद करना चाहते हैं। हर दिन हमारे पास दर्जनों ऐसी मेल आती हैं जिनमें ऐसे मरीजों का वेरिफिकेशन करने को कहा जाता है, जिनको वे दान दे सकें। इनमें से कुछ मामले सही होते हैं और कई मामलों में एनजीओ मरीज के इलाज के नाम पर पैसा कमाने के लिए ऐसा करते हैं। किसी तरह के फर्जीवाड़े को रोकने के लिए ऑनलाइन दान पॉलिसी प्रभावी रहेगी।’

Source-NBT